बनी भैंस (Banni Buffalo)

बनी भैंस
बनी भैंस

बनी भैंस भारत की एक स्वदेशी भैंस नस्ल है जिसे इंडियन काउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR), ब्रीड रजिस्ट्रेशन कमिटी, नई दिल्ली द्वारा भारत की 11वीं भैंस नस्ल के रूप में मान्यता दी गई है। यह नस्ल गुजरात के कच्छ जिले के बानी (Banni) क्षेत्र से उत्पन्न हुई है और परंपरागत रूप से वहाँ के मालधारियों द्वारा व्यापक (extensive) चरागाह-आधारित प्रणाली में पाली जाती है।


उत्पत्ति, भौगोलिक स्थान और चारागाह

  • उद्गम क्षेत्र: कच्छ का बानी मैदान (Banni grassland) — भुज, नखत्राना, अंजर, भावऊ/भाहाउ, लखपत, रापर और खवड़ा तहसीलें।
  • अवस्थिति निर्देशांक (आकस्मिक): लगभग 69°24′E, 23°42′N।
  • बानी घासभूमि का क्षेत्रफल: ≈ 3,847 वर्ग किमी।
  • क्षेत्र की मिट्टी स्वाभाविक रूप से क्षारीय/लवणयुक्त है (long-lost river deposits) और यहाँ 20+ प्रजातियों के पोषक घास और 20 प्रकार की झाड़ियाँ पायी जाती हैं।
  • क्षेत्रीय वर्षा भंडारण की पारम्परिक तकनीक “खुईरा (Khuira)” के माध्यम से की जाती है, जो पानी बचाने और संचयन की विशेष स्थानीय पद्धति है।

लाभ, विशेषताएँ और परंपरागत उत्पादन प्रणाली

  • बनी भैंस कठोर परिस्थितियों में टिकने में सक्षम, कठिन-परिश्रमी (hardy) और चरागाह-निर्भर (pastoral) उत्पादन प्रणाली के अनुकूल होती है।
  • परंपरागत रूप से मालधारियों (Maldharis) द्वारा रात को बानी घासभूमि पर चराई करवाई जाती है और भैंसें सुबह दुग्ध देने के लिए गाँव लौट आती हैं — यह प्रथा दैनी उच्च ताप से बचने और चरागाह संसाधन का पूर्ण उपयोग करने के लिये अपनायी गयी है।
  • मालधारियों ने लागत कम करने के उद्देश्य से स्थानीय रूप से उपयुक्त व्यापक (extensive) प्रोडक्शन सिस्टम विकसित किया है।

जनसंख्या (गुजरात राज्य) — जिलेवार (प्रदान किए गए आँकड़ों के अनुसार)

कुल राज्य स्तरीय अनुमानित संख्या: 5,25,015 (गुजरात)
(प्रमुख जिलों के आंकड़े)

  • कच्छ: 168,938
  • साबरकांठा: 78,622
  • सुरेन्द्रनगर: 55,588
  • खेड़ा: 39,710
  • बनासकांठा: 35,142
  • राजकोट: 17,585
  • गांधीनगर: 18,661
  • आदि (कुल तालिका अनुसार सभी जिले सम्मिलित)।

शारीरिक एवं रूपात्मक विशेषताएँ

  • रंग: अधिकांश शरीर काला (~90.09%) और कुछ पर कॉपर/तांबे जैसा (≈9.90%) रंग देखा जाता है; थूथन व पलकें काली/भूरी हो सकती हैं।
  • सींग (Horns): सींगों की अभिविन्यासता प्रायः ऊर्ध्वाधर होती है — inverted double coiling ≈31.20% तथा inverted single coiling ≈68.80% पशुओं में।
  • आंखें: प्रमुख, काली और चमकदार।
  • पूँछ: स्विच का रंग ~67.35% श्वेत और 32.65% काला; औसत पूँछ की लंबाई ≈ 88.39 ± 0.48 से.मी.
  • शरीर: मध्यम से बड़े, कॉम्पैक्ट; डेवलैप अनुपस्थित; नाभिक पट्टी (naval flap) मध्यम।
  • सिर/चेहरा: सिर चौड़ा, बीच में हल्की दबाव-रहित उभार; चेहरा तुलनात्मक रूप से लम्बा और सीधा। मुंह (muzzle) चौड़ा।
  • गर्दन: मध्यम और पतली, त्वचा पर अतिरिक्त मोड़ नहीं।
  • कान: अधिकांश में क्षैतिज अभिविन्यास; औसत कान की लंबाई ≈ 29.30 ± 0.08 से.मी.
  • त्वचा: नरम, पतली और प्रायः काली; कुछ पाये जाते हैं जिनके रंग में तांबे या अल्बिनो प्रकार भी मिलते हैं (≈6–7%)।
  • थन (Udder): अच्छी तरह विकसित, गोल और चौकोर स्थित; चारों क्वार्टर समान रूप से विकसित।
  • थन-बिंदु (Teats): अधिकांश में शंक्वाकार/कोनिकल थन (conical teats) होते हैं।

(आंकड़े: K.P. Singh व Sunesh द्वारा संकलित)


शारीरिक माप (Morphometrics)

लक्षणनर (Mean ± S.E)मादा (Mean ± S.E)
शरीर की लंबाई (से.मी.)143.67 ± 2.13 (n=18)153.01 ± 0.57 (n=384)
कंधे की ऊँचाई (से.मी.)137.64 ± 1.89 (n=18)137.25 ± 0.38 (n=388)
छाती परिधि (से.मी.)214.03 ± 5.10 (n=18)203.74 ± 0.60 (n=386)

उत्पादन प्रदर्शन (Production performance — फ़ील्ड स्थितियाँ / In-Situ Conservation Project से)

(SD Agricultural University, Sardarkrushinagar के 11वीं पंचवर्षीय योजना अन्तर्गत इन-साइटु प्रोजेक्ट के परिणाम)

  • औसत लैक्टेशन अवधि: 300.96 ± 4.43 दिन (n = 84)
  • औसत लैक्टेशन दूध उत्पादन: 2,857.21 ± 89.76 किग्रा (n = 84)
  • औसत दैनिक दूध उत्पादन: 11.53 ± 0.07 किग्रा (n = 1,207)
  • पीक दूध उत्पादन: 14.87 ± 0.21 किग्रा (n = 206)
  • औसत वसा (%): 6.65 ± 0.11 (n = 545)
  • औसत SNF (%): 8.79 ± 0.01 (n = 606)

ये आंकड़े क्षेत्रीय

/चरागाह आधारित परिस्थितियों में संकलित हैं और दर्शाते हैं कि बनी भैंसें उच्च दुग्ध क्षमता रखती हैं जब उन्हें पारंपरिक चरागाह व स्थानीय प्रबंधन मिलता है।


प्रजनन (Reproductive traits — फ़ील्ड स्थितियाँ)

मादा (Female): (फ़ील्ड डेटा)

  • औसत पहली बछियाई की आयु (Age at first calving): ≈ 40.28 ± 0.25 माह (n=294)
  • पहली सेवा अवधि (Service period): ≈ 85.64 ± 4.23 दिन (n=100)
  • सूखा काल (Dry period): ≈ 81.77 ± 4.41 दिन (n=44)
  • बछड़ा अंतराल (Calving interval): ≈ 372.43 ± 3.97 दिन (n=44)
  • गर्भधारण की अवधि (Gestation length): ≈ 301.0 ± 2.07 दिन (n=44)

परिणामों से संकेत मिलता है कि बानी नस्ल में प्रजनन क्षमता उच्च है और यह लगभग हर वर्ष बछड़ा देने की क्षमता दर्शाती है।


पालन-पोषण और पारंपरिक प्रबंधन प्रथाएँ

उत्पादन प्रणालियाँ (Production systems)

  1. विस्तृत (Extensive pastoral) प्रणाली:
    • Nakhatrana, Hajipeer (West Banni / Nani Banni) क्षेत्रों में अपनायी जाती है। भैसें शाम को जंगल/घासभूमि में भेजी जाती हैं, रात भर चरती हैं और सुबह गाँव लौट आती हैं। कई बार मालिक साथ नहीं जाते; भैंसें अपनी दिनचर्या स्वायत्त रूप से बनाए रखती हैं। मात्र दूध देने वाली भैंसों को दुग्ध समय पर सप्लीमेंटरी कंसन्ट्रेट दिया जाता है।
  2. अर्ध-घनत्व (Semi-intensive pastoral) प्रणाली:
    • East Banni / Greater Banni क्षेत्रों (Khavda, Bhirandiyara, Dhori, Sumrasar) में प्रचलित। दिन में पेड़ के साये में बाँधकर हरा/सूखा चारा दिया जाता है; रात को चराई के लिए घासभूमि ले जाया जाता है। दूध देने वाली भैंसों को मिल्किंग से पहले बैग (पावरो) में संकेंद्रित चारा दिया जाता है।

आवास व बंधन

  • अधिकांश पशु रात में खुला चरते हैं; युवा बछड़े व छोटे पशु एन्क्लोज़र में रखे जाते हैं। मिल्किंग के समय पशुओं को बाँधा नहीं जाता; परन्तु मालिक हाथों/टांगों में स्थानीय बंधन (Nunjan — आगे के पैर, Vangh — पिछले पैर) का प्रयोग करते हैं।

खुराक (Feeding management)

  • चराई पर निर्भरता अधिक; मिल्किंग के समय घरेलू मिश्रित कंसन्ट्रेट दिया जाता है। सामान्य मिश्रण:
    • कपास बीज का केक 25% + गेहूँ भूसा 75% @ 3–4 kg/animal
    • मूँगफली का केक 35% + गेहूँ भूसा 65% @ 4–5 kg/animal
  • सूखे मौसम/कमी में राज्य सरकार द्वारा Banni Development Scheme के तहत सूखा चारागाह/ड्राई फ़ीड उपलब्ध कराया जाता है; मालधारी भी थालिया (cotton hulls) खरीद कर 4–5 kg/दिन पशु को देते हैं (3–4 घंटे भिगोकर)।

बछड़ा प्रबंधन (Calf management)

  • बछड़े अलग लकड़ी/झाड़ियों से बने बाड़े में रखे जाते हैं; छाया में खुले रखकर उन्हें पर्यावरणीय चरम से बचाया जाता है। बछड़ों को दुग्ध (माँ का दूध) और सुबह-शाम कंसन्ट्रेट दिया जाता है; वे जंगल में चराई नहीं करते।

सामाजिक-आर्थिक प्रासंगिकता

  • बनी भैंसें मालधारियों की मुख्य आजीविका हैं — विशेषकर बिना भूमिक किसानों के लिए। परंपरागत चरागाह प्रणाली और बानी घासभूमि का उपयोग इन्हें न्यूनतम लागत में उच्च उत्पादन देने में सक्षम बनाता है।
  • बानी नस्ल की उच्च उत्पादकता व स्थानीय अनुकूलता ने संरक्षण कार्यक्रमों और इन-साइटु संरक्षण परियोजनाओं के जरिए इस नस्ल पर ध्यान आकर्षित किया है।

स्रोत और सहयोगी योगदान

  • K.P. Singh एवं Sunesh — क्षेत्रीय सर्वेक्षण तथा नस्ल विवरण।
  • S.D. Agricultural University, Sardarkrushinagar — In-Situ Conservation Project (11वीं पंचवर्षीय योजना) द्वारा संकलित उत्पादन आँकड़े।
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