भदवाली भैंस (Bhadawari Buffalo)

भदवाली भैंस
भदवाली भैंस

भदवाली भैंस एक पारंपरिक भारतीय जल-भैंस नस्ल है, जिसे विशेषकर अपने उच्च वसा-युक्त दूध (butterfat) के लिए जाना जाता है — कभी-कभी दूध में वसा 13–14% तक दर्ज की गई है। इस नस्ल का ऐतिहासिक और पारंपरिक प्रजनन इलाका उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश के यमुना-चम्बल के खाई (ravine) क्षेत्रों में स्थित रहा है। भदावाड़ी (Bhadawar) रियासत के नाम से इस नस्ल को स्थानीयत: नामित किया गया और वैज्ञानिक साहित्य में इसका विस्तृत परिचय Kaura (1950, 1961) तथा बाद के सर्वेयरों ने दिया।


उत्पत्ति एवं प्रजनन क्षेत्र

  • भदवाली भैंसों का पारंपरिक घराना यमुना-चम्बल के खाई-क्षेत्र (ravines) में फैला हुआ है। ऐतिहासिक रूप से इनके प्रजनन क्षेत्र में आगरा, एटा/एटावा, जालौन, कानपुर, झांसी और आसपास के हिस्से शामिल रहे हैं; मध्य प्रदेश के भिण्ड और मरेना जिलों में भी यह नस्ल पायी जाती है। (Kaura 1961; Kushwaha et al. 2007)
  • Bhadawar (पूर्व की भदावर संपत्ति) इसी नस्ल के नाम की स्रोत मानी जाती है।

वितरण और जनसंख्या-प्रवृत्ति

  • 1977 में उत्तर प्रदेश में भदवाली जनसंख्या ≈ 1.139 लाख थी, जो 1991 में ≈ 0.982 लाख रह गई — लगभग 17.78% की कमी। बाद के सर्वे एवं नेटवर्क प्रोजेक्ट (Kushwaha et al., 2007) ने भी इस नस्ल की तीव्र गिरावट बताई; स्थानीय सर्वे पर आधारित अनुमान breeding tract में शुद्ध भदवाली आबादी ≈ 30,000 बताई गई। किन्तु 2007 के 18वें पशुधन जाति-वार जनगणना में उच्च संख्या (≈ 7.24 लाख) भी रिपोर्ट हुई — रिपोर्टों में असंगति के कारण क्षेत्रीय सर्वे संकेतक अधिक विश्वसनीय माने जाते हैं।
  • गिरावट के प्रमुख कारण: भदवाली नर-बैल/बुल्स की कमी, कम औसत दुग्ध उत्पादन/लैक्टेशन अवधि (पर वसा अधिक), चरागाह की कमी, आधुनिक कृषि मेकैनाइज़ेशन तथा किसान-रुचि का मुर्रा जैसी अधिक दूध देने वाली नस्लों की ओर शिफ्ट होना।

शारीरिक और रूपात्मक विशेषताएँ

  • रंग: प्रायः तांबे-रंग (copper) या लाल-भूरे शेड; बाल काले जड़ों से आरम्भ होकर टिप पर लाल-भूरी होते हैं; कभी पूर्ण ब्राउन भी।
  • आकार: मध्यम आकार; फ़ुर्तीला/वेड्ज़-आकार (wedge-shaped) शरीर।
  • सिर: अपेक्षाकृत छोटा, हल्का, सिर के बीच भाग में उभार और सिर का समग्र रूप सीधापन के साथ। नरों में सिर थोड़ा भारी और मोटा।
  • सींग: सामान्यतः पिछे की ओर बढ़कर ऊपर की ओर मुड़ते और अंदर की ओर झुकते, नुकीले टिप के साथ; आकार औसत मोटाई के।
  • पूँछ: लंबी, पतली, हॉक्स तक पहुंचती; स्विच काले-सफेद मिश्रित दिखाई देते हैं।
  • थन/थीति: थन मुर्रा के समान अत्यंत विकसित नहीं पर दूध की नसिकाएँ (milk veins) स्पष्ट रहती हैं; थन-बिंदु मध्यम आकार के और समान नहीं भी हो सकते।

वजन, वृद्धि और आकार-मान (Morphometrics & Growth)

(IGFRI, Jhansi तथा फ़ार्म रिपोर्टों के सम्मिलित आँकड़े)

चरणनर (Mean ± S.E) kgमादा (Mean ± S.E) kg
जन्म (At birth)27.30 ± 0.8526.50 ± 1.17
3 माह43.00 ± 0.9940.90 ± 1.44
6 माह67.80 ± 2.5862.75 ± 3.30
12 माह114.35 ± 4.63108.75 ± 3.42
18 माह180.00 ± 6.48168.20 ± 5.95
24 माह242.50 ± 9.93232.14 ± 8.33
प्रथम बछियाई (At first calving)326.71 ± 10.83
  • वयस्क औसत भार के विभिन्न रिपोर्ट: नर ≈ 422–426 kg; मादा ≈ 385–402 kg (विभिन्न अध्ययनों के अनुसार)। (Singh & Desai 1962; Bhat 1981; IGFRI)

दूध उत्पादन और दूध-गुणवत्ता

  • औसत लैक्टेशन अवधि: ≈ 291.46 ± 5.27 दिन (n=188)।
  • औसत लैक्टेशन उत्पादन: ≈ 1,231.93 ± 27.65 kg (n=188)।
  • पीक दूध (Peak): ≈ 6.93 ± 0.09 kg (n=188)।
  • औसत वसा: IGFRI-निगरानी में औसत वसा ≈ 8.09% (रेंज: 5.5% – अधिकतम 14%) — अन्य अध्ययनों में 7.5–8.6% के बीच रिपोर्ट। (Singh & Desai 1962; Pundir et al. 1996; Kushwaha et al. 2007)
  • औसत SNF (Solid-not-Fat): ≈ 10.90% (IGFRI)।
  • कुल ठोस (TS): ≈ 19.00% (IGFRI)।

प्रजनन विशेषताएँ और ऋतुवादिता (Seasonality)

  • भदवाली भैंसें क्षेत्रीय सर्वे में अक्सर ऋतुसम्बंधी प्रजनन (seasonal breeding) दिखाती हैं — अधिकतर गर्मियों की अपेक्षा शीतकाल में गर्मी-प्रदर्शन (estrus) अधिक होता है। Sharma et al. (2003) ने बताया कि ≈50% गर्मी सर्दियों में एवं केवल ≈2.1% गर्मी ग्रीष्मकाल में प्रकट हुई। Dwivedi (1991) ने भी अक्टूबर में सर्वाधिक और मई में न्यूनतम गर्मी रिपोर्ट की।
  • रिपोर्ट किए गए प्रजनन पैरामीटर (विभिन्न शोधों के सम्मिलित आंकड़े) में प्रथम बछियाई (AFC) लगभग 45–51 माह के बीच रिपोर्ट हुई हैं (अध्ययन पर निर्भर)। कुछ अध्ययनों में सर्विस पीरियड, ड्राई-पीरियड और कैल्विंग-इंटरवल भी रिपोर्ट किए गए हैं — पर व्यापक मतभेदों के कारण क्षेत्रीय संदर्भ महत्वपूर्ण है।

आवास, प्रबंधन और भोजन (Housing & Management)

  • पारंपरिक आवास: मिट्टी के घर/छप्पर — फर्श पर मिट्टी/गोबर-प्लास्टर, छत पर किरणे/तिनके; शेड घर की दीवार के साथ झुका हुआ बना होता है। लगभग 44% किसानों के पास कच्चे (kachcha) शेड, 30% के पास पक्के शेड और 25.6% के पास छप्परित शेड रिपोर्ट हुए। अधिकांश शेड घर के हिस्से के रूप में हैं।
  • परिचालन: लगभग 62.1% किसान सेमी-इंटेंसिव (grazing + stall fed) रखरखाव करते हैं; शेष शालीन/स्टॉल-फीडिंग पर निर्भर। बछड़ों को माँ-दूध दिया जाता है तथा विहावन (weaning) प्रायः नहीं की जाती। डिहोर्निंग कम प्रचलित; डेवार्मिंग केवल कुछ खेतों में (≈16.9%) होती है।
  • भदवाली कभी-कभी पिछले दशकों में बबूल की वृद्धि से चरागाह की घटती उपलब्धता के कारण अब अधिकतर स्टॉल-फीड किए जा रहे हैं; स्थानीय सूखे चारे जैसे ज्वार-कदबी, गेहूँ का भूसा सामान्य हैं। समग्री चारे को पानी में भिगोकर उबालकर देना तथा मिश्रण में चारा मिलाना सामान्य प्रथा रही है (किसानों का मानना: उबला चारा गर्भधारण को सुगम बनाता है)।

पालन-विधियाँ और पुल्लिंग (Breeding practices)

  • लगभग अधिकांश किसान प्राकृतिक सेवा (natural service) पर निर्भर (≈85.6%); कृत्रिम गर्भाधान (A.I.) का प्रयोग बहुत कम (≈4.1%); कुछ दोनों (≈10.2%) अपनाते हैं।
  • क्षेत्र में भदवाली बुल्स की तीव्र कमी है; ऐसे में मुर्रा-सीमन का उपयोग A.I. केंद्रों द्वारा किया जाता है, जिससे नस्लीय शुद्धता पर प्रभाव पड़ता है। कुछ क्षेत्रों में विशेष समुदायों (जैसे Nut community) के बुल्स सेवाएँ प्रदान करते हैं।

संरक्षण स्थिति और चुनौतियाँ

  • संख्या में गिरावट: कई सर्वे (Pundir et al. 1997; Kushwaha et al. 2007; क्षेत्रीय रिपोर्टें) बताते हैं कि शुद्ध भदवाली आबादी घटकर कुछ हजारों तक सीमित हो गई है— breeding tract के कई हिस्सों में शुद्ध भदवाली मिलना कठिन है।
  • मुख्य कारण: बुल्स की कमी, चरागाह/भोजन स्रोतों की कमी, कृषि-मेकैनाइज़ेशन, किसानों की प्राथमिकता उच्च-दूध देने वाली नस्लों (जैसे मुर्रा) की ओर, तथा लैक्टेशन अवधि/औसत दूध उत्पादन का तुलनात्मक रूप से कम होना (पर वसा अधिक)।
  • संरक्षण आवश्यकता: क्षेत्रीय-आधारित संरक्षण, शुद्ध बुल्स का संरक्षण एवं प्रजनन कार्यक्रम, स्थानिक गोदाम/चरागाह संरक्षण नीतियाँ और किसानों को आर्थिक रूप से समर्थन आवश्यक है ताकि यह कीमती जीन-स्रोत बचाया जा सके।

संदर्भ (चयनित)

  • Kaura R.L., 1950, 1961 — प्रारम्भिक और विस्तृत वर्णन।
  • Zachariah (1941) — प्रारम्भिक वर्णन: “Bhadawan” भैंस।
  • Singh & Desai (1962); Bhat (1981) — शारीरिक एवं वज़न-रिपोर्ट।
  • Pundir et al. (1996); Nivsarkar et al. (2000); Kushwaha et al. (2007) — क्षेत्रीय सर्वे एवं जन्म-विकास/उत्पादन आँकड़े।
  • IGFRI, Jhansi — संस्थागत प्रजनन/दूध-गुणवत्ता आँकड़े।
  • Sharma et al. (2003); Dwivedi (1991) — प्रजनन-ऋतुवादिता पर अध्ययन।

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