
मुर्रा भैंस भारत की सबसे प्रसिद्ध और सर्वाधिक उत्पादक जल-भैंस नस्ल है, जिसका मूल स्थान (Origin) उत्तर-पश्चिम भारत का मैदान क्षेत्र है। “मुर्रा” शब्द का अर्थ है घुँघराले या मुड़े हुए सींग, जो इस नस्ल की प्रमुख पहचान है। कभी-कभी इसे “दिल्ली भैंस” भी कहा जाता है, क्योंकि इसका उत्पत्ति केंद्र दिल्ली और हरियाणा क्षेत्र माना जाता है।
मुर्रा भैंसें उच्च दूध उत्पादन, अधिक वसा प्रतिशत और अनुकूलन क्षमता के कारण भारत और विश्वभर में सर्वाधिक लोकप्रिय भैंस नस्लों में से एक हैं। भारत के अलावा यह नस्ल कई देशों जैसे ब्राज़ील, फिलीपींस, मलेशिया, थाईलैंड, चीन, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार, वियतनाम, श्रीलंका, बुल्गारिया और इंडोनेशिया में भी पाई जाती है।
उत्पत्ति एवं प्रजनन क्षेत्र
मुर्रा भैंसों का मुख्य प्रजनन क्षेत्र हरियाणा राज्य का दक्षिणी भाग है, जिसमें रोहतक, जींद, हिसार, झज्जर, फतेहाबाद, गुरुग्राम और दिल्ली (संघ राज्य क्षेत्र) प्रमुख हैं।
- भौगोलिक स्थिति:
अक्षांश 28°15′ से 30°00′ उत्तर और देशांतर 75°45′ से 78°80′ पूर्व के बीच। - भूमि व जलवायु:
यह क्षेत्र हल्की बनावट वाली रेतीली या दोमट मिट्टी वाला है, जिसमें नाइट्रोजन व फास्फोरस की मात्रा मध्यम से उच्च स्तर की पाई जाती है।
जलवायु गर्म और शुष्क है; गर्मियों में तापमान 45°C तक और सर्दियों में न्यूनतम तापमान शून्य के समीप तक पहुँच जाता है।
जनसंख्या स्थिति
भारत में लगभग 2.05 करोड़ मुर्रा मादा भैंसें पाई जाती हैं, जो देश की कुल भैंस आबादी का लगभग 20% हिस्सा हैं।
हरियाणा में भैंसों की संख्या 1982 में 33.7 लाख से बढ़कर 2003 में 60.3 लाख हो गई — अर्थात 20 वर्षों में लगभग 80% की वृद्धि।
हालांकि 2003 से 2007 के बीच थोड़ी गिरावट दर्ज की गई (लगभग 0.34% प्रति वर्ष)।
मुख्य शारीरिक विशेषताएँ
| लक्षण | विवरण |
|---|---|
| रंग (Body colour) | चमकदार जेट-काला (Jet Black)। कभी-कभी चेहरे या पैरों पर छोटे सफेद निशान हो सकते हैं, लेकिन इन्हें पसंद नहीं किया जाता। |
| सींग (Horns) | छोटे, कसकर मुड़े हुए, पीछे और ऊपर की ओर घूमते हुए सर्पिल आकार के। उम्र बढ़ने पर सींग ढीले होकर अधिक मुड़े हुए दिखाई देते हैं। |
| आँखें (Eyes) | काली, चमकदार और सक्रिय। मादाओं की आँखें उभरी हुई, नर में कुछ धंसी हुई। कॉर्निया पर सफेदी (walled eye) नहीं होनी चाहिए। |
| पूँछ (Tail) | लंबी, घुटने तक पहुँचने वाली; काली या सफेद स्विच (अधिकतम 6 इंच तक)। |
| शरीर (Body) | मजबूत, भारी और वेज-आकार का शरीर। |
| सिर (Head) | मध्यम आकार का। |
| गर्दन (Neck) | मादाओं में लंबी व पतली; नर में मोटी और शक्तिशाली। |
| कान (Ears) | छोटे, पतले और सतर्क मुद्रा वाले। |
| त्वचा (Skin) | मुलायम, चिकनी और बाल कम; अन्य भैंसों की तुलना में त्वचा मजबूत परंतु लचीली। |
| थन (Udder) | पूर्ण विकसित, नीचे लटकता हुआ; चारों थनों का वितरण समान रूप से व्यवस्थित। |
| थन की नलियाँ (Teats) | लंबी, समान दूरी पर स्थित; पीछे के थन आगे वालों से कुछ लंबे। |
शरीर माप
| लक्षण | नर | मादा |
|---|---|---|
| शरीर लंबाई (से.मी.) | 150 | 148 |
| कंधे की ऊँचाई (से.मी.) | 142 | 133 |
| छाती परिधि (से.मी.) | 220 | 202 |
| जन्म भार (किग्रा) | 31.7 | 30 |
| वयस्क वजन (किग्रा) | 450–800 (औसत 567) | 350–700 (औसत 516) |
दूध उत्पादन
मुर्रा भैंसें उच्च दूध उत्पादन के लिए जानी जाती हैं। विभिन्न अध्ययनों में दूध उत्पादन स्थान, पालन व्यवस्था और आहार के अनुसार भिन्न पाया गया है।
| लक्षण | औसत मूल्य (रेंज) |
|---|---|
| औसत लैक्टेशन अवधि | 290 – 330 दिन |
| औसत लैक्टेशन दूध उत्पादन | 1600 – 2000 किग्रा |
| औसत दैनिक दूध उत्पादन | 6 – 8 किग्रा |
| उच्चतम दूध उत्पादन (Peak Yield) | 7 – 10 किग्रा |
| औसत वसा प्रतिशत (Fat%) | 6.5 – 7.5% |
| आयु के साथ उत्पादन स्थायित्व | उच्च; बाद की लैक्टेशनों में भी उत्पादन बरकरार रहता है। |
जीवनकाल दूध उत्पादन (Lifetime Yield):
4–5 लैक्टेशन तक कुल दूध उत्पादन 4,500 से 10,000 किग्रा तक दर्ज किया गया है।
प्रजनन प्रदर्शन
| लक्षण | औसत मान |
|---|---|
| पहली बछियाई की औसत आयु | 44–52 माह (1310–1550 दिन) |
| सेवा अवधि (Service Period) | 150–180 दिन |
| सूखी अवधि (Dry Period) | 145–190 दिन |
| कैल्विंग अंतराल (Calving Interval) | 450–490 दिन |
| गर्भावधि अवधि (Gestation Period) | ~310 दिन |
| गर्भधारण प्रति गर्भधारणा औसत सेवा संख्या | 1.9 सेवाएँ |
आवास एवं पालन प्रबंधन
- प्रजनन क्षेत्र में मिश्रित प्रकार की आवास व्यवस्था देखी जाती है।
- भैंसों को अक्सर खुले में पेड़ या खंभे से बाँधा जाता है, पर अत्यधिक मौसम में शरण दी जाती है।
- अधिकांश मकान पक्की दीवारों और कच्ची ज़मीन वाले होते हैं तथा वेंटिलेशन अच्छा होता है।
खुराक व चारा
- अधिकांशतः स्टाल-फेड प्रणाली अपनाई जाती है।
- हरी चारा (रबी में): बरसीम, जई, सरसों।
- हरी चारा (खरीफ में): बाजरा, ज्वार, ग्वार।
- सूखा चारा: गेहूं की भूसी, दालों का भूसा, तेल-खली और मिश्रित आहार।
- दुग्ध उत्पादन बढ़ाने हेतु तेलखली और दाना आहार नियमित दिया जाता है।
- मादा भैंसों की देखरेख एवं दुग्ध कार्यों में प्रायः 80% महिलाएँ सक्रिय रूप से संलग्न रहती हैं।
प्रजनन प्रणाली
- अधिकांश किसान प्राकृतिक सेवा (Natural Service) का उपयोग करते हैं।
- कृत्रिम गर्भाधान (A.I.) सीमित मात्रा में अपनाया जाता है।
- शुद्ध मुर्रा नरों की कमी के कारण कभी-कभी क्रॉस-ब्रीडिंग भी देखी जाती है।
वैश्विक प्रसार
मुर्रा भैंसों की उत्कृष्ट दूध क्षमता के कारण यह नस्ल कई देशों में निर्यात की गई और स्थानीय भैंस नस्लों के सुधार में प्रयोग हुई।
इन देशों में प्रमुख हैं:
ब्राज़ील, थाईलैंड, चीन, मलेशिया, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार, वियतनाम, बुल्गारिया और श्रीलंका।
निष्कर्ष
मुर्रा भैंस न केवल भारत की बल्कि विश्व की सबसे उत्पादक और लोकप्रिय भैंस नस्लों में से एक है।
इसकी ऊँची दूध उत्पादन क्षमता, अधिक वसा प्रतिशत, सहनशीलता और अनुकूलन क्षमता ने इसे “ब्लैक गोल्ड ऑफ इंडिया” (India’s Black Gold) का दर्जा दिलाया है।
सही पोषण, स्वास्थ्य देखरेख और आनुवंशिक सुधार कार्यक्रमों के माध्यम से यह नस्ल ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है।
संदर्भ
- Singh et al. (1990); Gajbhiye & Tripathi (1991, 1999)
- Raheja (1992); Sharma (1996); Nath (1998)
- Dutt & Taneja (1994); Kuralkar & Raheja (2000)
- Statistical Abstract of Haryana (2003, 2007)
- CIRB, Hisar — Murrah Buffalo Performance Records